सैलरी न मिलने से परेशान BSNL कर्मचारियों का बड़ा फैसला! 80 हज़ार कर्मचारियों ने मांग ली रिटायरमेंट

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BSNL कंपनी के करीब 80 हज़ार कर्मचारियों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना यानी कि वीआरएस के लिए आवेदन दे दिया है। जिस कंपनी में करीब 1.7 लाख लोग काम करते हैं वहां के 80 हज़ार लोग अपनी मर्ज़ी से रिटायर होना चाहते हैं। आखिर क्यूँ? इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए, BSNL की हालत ही कुछ ऐसी है।

BSNL ,यानी कि भारत संचार निगम लिमिटेड, एक सरकारी दूरसंचार कंपनी है। सरकार ने BSNL और MTNL का विलय पहले ही कर दिया है क्योंकि दोनों ही कंपनियां घाटे में चल रही हैं। इसके बाद सरकार ने कर्मचारियों की संख्या आधी करने के लिए उन्हें वीआरएस (VRS) देने के लिए भी कहा है।

लेकिन BSNL के कर्मचारी अपनी नौकरी स्वैच्छिक रूप से केवल इसलिए नहीं छोड़ रहे हैं क्योंकि सरकार ने ऐसा करने को कहा है। वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस सरकारी कंपनी में काम करना उनके लिए मुश्किल हो गया है। उन्हें महीनों-महीनों वेतन नहीं दिया जाता है। BSNL को अपनी कमाई का 75 प्रतिशत हिस्सा कर्मचारियों के वेतन में ही लगाना पड़ता है, जिसको वो ठीक तरह से दे भी नहीं पा रही। साथ ही कंपनी दूसरे ज़रूरी कामों को भी फण्ड नहीं कर पाती। यही वजह है जिसके कारण इसके ग्राहकों में भारी कटौती हुई है।

ये तो साफ़ है कि BSNL और MTNL जैसी सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही हैं।

सरकारी दूरसंचार कंपनियों के कर्मचारी अगर कम होंगे तो उसको कम खर्च उठाना पड़ेगा। कंपनी पर कर्ज़ तो कम होगा लेकिन इसका नुकसान जनता को होगा। इनकी बची-कुची सुविधा और भी खराब हो जाएगी।

ये नुकसान केवल यहाँ के कर्मचारियों की बदौलत नहीं हो रहा है, बल्कि सरकार की लापरवाही भी एक कारण है। देश के प्रधानमंत्री भी ‘जियो’ जैसी प्राइवेट कंपनी के लिए विज्ञापन में आ सकते हैं, लेकिन सरकारी कंपनी में सुधार करने की नीतियों नहीं ला सकते हैं।

वैसे भी मोदी सरकार सरकारी कंपनियों में सुधार करने के बजाए उन्हें बेचना पसंद करती है। इसका फायदा निजी क्षेत्र की कंपनियों को होता है और नुकसान आम जनता को।