गांधी के चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष तक भारत किसानों का क़ब्रगाह बन गया है

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देश भर के किसान एकजुट होकर लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर पूरे देश में किसान आत्महत्याएं भी जारी हैं. महाराष्ट्र में क़र्ज़ माफ़ी के बाद 5 महीने में 1,020 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

किसान मौत को हमेशा अपना तकिया बना कर सोने वाली महान प्रजा हैं.
-महात्मा गांधी

यह लिखने वाले गांधी ने यह नहीं सोचा होगा कि जिस आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत वे किसानों की तरफ खड़े होकर शुरू कर रहे हैं, वही देश आज़ाद होकर किसानों के लिए इतना बुरा साबित होगा कि उनके लिए जीने की परिस्थितियां न रह जाएं. अंग्रेज़ों के ज़ुल्म से किसानों को मुक्ति दिलाने 15 अप्रैल, 1917 को गांधी एक गुमनाम व्यक्ति राजकुमार शुक्ल के निमंत्रण पर मोतिहारी पहुंचे थे. इस आंदोलन के बाद महात्मा गांधी की आस्था भारत के गरीबों और किसानों पर गहरी होती गई.

फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन-समारोह में गांधी ने कहा था- ‘हमें आज़ादी किसानों के बिना नहीं मिल सकती. आज़ादी वकील, डॉक्टर या संपन्न ज़मींदारों के वश की बात नहीं है.’

आज जब देश का मुखिया ‘नये भारत’ का नारा दे रहा है, उसी समय लगभग पूरे साल देश भर में किसानों ने आंदोलन किया और वह अनसुना रह गया. महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह का यह शताब्दी वर्ष है. जिस महाराष्ट्र में आश्रम बनाकर महात्मा गांधी गांवों की मुक्ति की कल्पना कर रहे थे, वही महाराष्ट्र सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याओं का गवाह है.

गांधी का नेतृत्व और आंदोलन उन गरीबों और किसानों के लिए था, जिनको भूखा नंगा देखकर गांधी ने एक धोती पहननी शुरू कर दी थी. आज का ‘न्यू इंडिया’ रिकॉर्ड किसान आत्महत्याओं की चीख को दबाकर बनाया जाएगा.

किसानों पर कर्ज और फसलों के उचित दाम न मिलने जैसे मुद्दे पर भले ही देश भर के किसान संगठन एक साथ आकर आंदोलन कर रहे हों, लेकिन आर्थिक तंगी और कर्ज के चलते किसानों की आत्महत्या की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं.

एक तरफ नई दिल्ली में 184 किसान संगठनों की दो दिवसीय किसान मुक्ति संसद खत्म हुई है, दूसरी तरफ देश के कई प्रांतों से किसानों की आत्महत्या की ख़बरें भी आ रही हैं. ओडिशा में 24 घंटे में तीन किसानों ने आत्महत्या कर ली. उधर, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से भी दो किसानों की आत्महत्या की खबर है.

लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी देश भर में अपनी रैलियों में कह रहे थे कि हम किसानों की आय दोगुनी करेंगे, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करेंगे. किसानी को फायदे का सौदा बनाएंगे.

लेकिन अब मोदी के प्रधानमंत्री के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया, न ही किसानों के मसले पर चर्चा की. जबकि हालत यह है कि देश भर में किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं. तब मोदी कह रहे थे कि किसानों की आय दोगुनी करेंगे, अब किसान पूछ रहे हैं कि किसानों की आय दोगुनी कब होगी.

जून में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में किसानों के आंदोलन के बाद मंदसौर में पुलिस गोलीबारी में छह किसान मारे गए थे. इसके बाद देश भर के किसान संगठनों ने अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति नाम से एक साझा मंच बनाया और देश के कई प्रांतों में किसान मुक्ति यात्रा निकाली.

इसी क्रम में सोमवार और मंगलवार को दिल्ली के संसद मार्ग पर दो दिवसीय किसान मुक्ति संसद का आयोजन किया गया, जिसमें देश भर से हज़ारों की संख्या में किसानों ने शिरकत की. इस समिति की ओर से लगातार यह मांग उठाई जा रही है कि सरकार पूर्ण कर्जमुक्ति और न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुरंत घोषणा करे. लेकिन अब तक सरकार की तरफ से इस मसले पर कोई बातचीत तक नहीं की गई है. दूसरी तरफ, देश भर से लगातार किसानों की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं.

दिल्ली के संसद मार्ग पर देश भर के 184 किसान संगठनों की ओर से दो दिवसीय किसान मुक्ति संसद लगाई गई

महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां पर देश भर में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं. महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह के रूप में कुख्यात है. महाराष्ट्र सरकार ने पांच महीने पहले किसान कर्ज माफी के लिए 34000 करोड़ रुपये की घोषणा की थी. कर्ज माफी की घोषणा के बाद राज्य में 1020 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

अंग्रेजी अखबार द हिंदू की एक रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार की कर्ज माफी की घोषणा के बाद पांच महीने के भीतर राज्य में 1020 किसानों ने आत्महत्या कर ली. जबकि राज्य सरकार द्वारा घोषित कर्ज माफी योजना का लागू किया जाना अभी बाकी है.

राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में एक जनवरी से 31 अक्टूबर तक 2414 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इसमें से 1020 आत्महत्याएं जुलाई से अक्टूबर के बीच की हैं. सबसे ज्यादा आत्महत्याएं अमरावती ओर विदर्भ क्षेत्र में हुई हैं.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में बुधवार को प्रकाशित एक खबर में कहा गया है कि ओडिशा में 24 घंटे के अंदर तीन किसानों ने आत्महत्या कर ली. राज्य सरकार द्वारा बेमौसम बारिश होने, सूखा पड़ने के चलते खराब हुई फसलों का मुआवजा देने के लिए सरकार की घोषणा के बावजूद राज्य में किसान आत्महत्याएं जारी हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, ये तीनों आत्महत्याएं ओडिशा के बरगढ़, संभलपुर और सुंदरगढ़ में हुई हैं. इन तीनों जिलों में पिछले एक महीने में 13 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इस दौरान अकेले बरगढ़ जिले में सात किसानों ने आत्महत्या की है.

बरगढ़ के प्रदीप कुमार ने सोमवार को जहर पी लिया. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई. प्रदीप ने डेढ़ एकड़ धान की खेती की थी, लेकिन फसल खराब हो गई.

संभलपुर के कान्हू मुंडा ने भी पेस्टिसाइड पीकर आत्महत्या कर ली. उनके परिजनों ने बताया कि फसल में कीड़े लगने और बेमौसम बारिश से फसल खराब होने से कान्हू बहुत निराश हो गए थे.

सुंदरगढ़ के मनोज सिंह ने सोमवार रात को जहर पी लिया जिसके चलते उनकी मौत हो गई. मनोज के परिजन उन्हें अस्पताल ले गए जहां पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. मनोज ने कई जगह से कर्ज लेकर खेती की थी लेकिन फसल खराब होने के कारण वे परेशान थे.

देशबंधु अखबार की एक खबर में कहा गया है कि महाराष्ट्र के ‘मराठवाड़ा क्षेत्र में कर्ज और फसल के खराब होने के चलते से परेशान 47 किसानों ने पिछले दो सप्ताह के दौरान आत्महत्या कर ली.’ अखबार ने लिखा है, ‘इस वर्ष एक जनवरी से 19 नवंबर तक कुल 847 किसानों ने आत्महत्या की है. अधिकतर किसानों ने फांसी लगाकर, जहर खाकर या कुएं में कूद कर जान दी है.

आंध प्रदेश के विजयवाड़ा में बुधवार को तीन किसानों ने पुलिस स्टेशन में आत्महत्या करने की कोशिश की. खबर है कि नन्ना पुलिस स्टेशन में पुलिस के सामने कृष्णा जिले के तीन किसानों ने कीटनाशक पी लिया. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट में कहा गया है कि एक साल पहले पेनूगोलानू गांव के 210 किसानों ने मिर्च की खेती की थी.. उन्होंने लक्ष्मी तिरुपतम्मा नर्सरी से बीज लिया था. बाद में उन्हें पता चला कि वह बीज बहुत खराब गुणवत्ता का था. किसानों की अपील पर जिला कलेक्टर ने नर्सरी को 2.35 करोड़ का हर्जाना भरने का आदेश दिया लेकिन इसके खिलाफ नर्सरी के मालिक ने हाईकोर्ट से स्टे ले लिया.

इस पर किसानों ने नर्सरी के मालिक के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित किया था. इस दौरान पुलिस ने किसानों को रोक लिया और थाने ले गई. इस दौरान नाराज किसानों में से तीन से कीटनाशन पी लिया.

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक महिला ने खुदकुशी कर ली. पत्रिका अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, औरंगाबाद के देउलगांव में महिला भागीरथी बाई ने कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली. महिला पर दो लाख का बैंक कर्ज था. पति की पहले ही मौत हो चुकी थी, जिसके बाद महिला के लिए रोजी रोटी चला पाना मुश्किल हो रहा था.

मध्य प्रदेश के बड़वानी में एक आदिवासी किसान ने आत्महत्या कर ली. पत्रिका की ही खबर के मुताबिक, बड़वानी की तहसील राजपुर के मुर्जालीखुर्द गांव के 45 वर्षीय किसान रेमसिंह मंगलवार रात को खेत में सिंचाई के लिए गए थे. रात को करीब 12 बजे घर लौट कर उन्होंने अपनी बहू को बताया कि उन्होंने जहर पी लिया है. परिजन उन्हें अस्पताल ले गए लेकिन उनकी मौत हो गई.

रेमसिंह पर सोसायटी का 1.22 लाख का कर्ज था. परिजनों का कहना है कि रेमसिंह को एक महीने पहले ही सोसायटी का नोटिस मिला था, जिसके चलते वे परेशान थे. रेमसिंह की ज्वार, कपास और मक्का की फसलें खराब हो गई थीं. गांव के सरपंच बारचा ने अखबार को बताया कि रेमसिंह ने उनसे कहा था कि वह बहुत परेशान है. वह डरा हुआ भी था.

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में भी एक किसान ने आत्महत्या करने की कोशिश की. पत्रिका ने खबर दी है कि जिले में खैरागढ़ क्षेत्र के खुर्सीपार निवासी किसान बोधन साहू ने कर्ज से परेशान होकर जान देने की कोशिश की. रिपोर्ट में कहा गया है कि हर बार की तरह इस मामले में भी प्रशासन ने कहा है कि नशे का आदी होने के कारण किसान ने आत्मघाती कदम उठाया.

उधर पंजाब में भाजपा ने आरोप लगाया है कि कैप्‍टन अमरिंदर सिंह सरकार के अाठ महीने के शासन में 323 किसान आत्महत्‍या कर चुके हैं. भाजपा की पंजाब इकाई के सचिव विनीत जोशी व उपाध्यक्ष हरजीत सिंह ग्रेवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार के आठ महीने के कार्यकाल में 323 किसानों की आत्महत्या कर ली. उन्‍होंने कहा कि किसानों का पूर्ण कर्ज माफी का वायदा सरकार आज तक पूरा नहीं कर पाई है. कर्ज माफी की आस में किसान ने दिसंबर 2016 से कर्ज वापस करना बंद कर दिया, जिसके चलते 93778 किसान डिफाल्टर हो चुके हैं. भाजपा ने पंजाब की कांग्रेस सरकार को किसान विरोधी करार दिया.

जब कांग्रेस केंद्रीय सत्ता में थी तो भाजपा आरोप लगाती थी. अब भाजपा केंद्रीय सत्ता में है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कह दिया है कि किसानों की कर्जमाफी संभव नहीं है. केंद्र ने राज्यों से भी कह दिया है कि राज्य अगर किसानों का कर्ज माफ करते हैं तो अपने कोष से करें. केंद्र सरकार उन्हें धन मुहैया कराने की स्थिति में नहीं है. यानी एक तरह से राजनीतिक दल किसानों की मुसीबतों का हल खोजने की जगह सिर्फ एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं.

गौरतलब है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, 1995 से लेकर अब तक देश में करीब सवा तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. किसान आंदोलनों ने जुड़े कार्यकर्ता बताते हैं कि यह संख्या ब्यूरो के आंकड़ों से कहीं ज्यादा है.

सवाल उठता है कि क्या कर्ज की फांस में फंसे किसानों के सामने क्या मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं है? क्या बैंक से किसानों को कर्ज दिलवाने वाली सरकारों को मरते हुए किसानों से कोई लेना देना नहीं है? क्या लाखों किसानों की जान की कीमत मात्र कुछ चुनावी जुमले हैं? क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपनी नीतियों के कारण हो रही मौतों को रोकने के लिए गंभीरता से सोचे?

चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष पर गांधी के नाम खूब आयोजन हुए. हाल के वर्षों में गांधी को इंटरनेशनल ब्रांड बनाकर खूब राजनीतिक लाभ भी कमाए गए. फिर गांधी का अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का दर्शन स्वच्छता अभियान में बदल गया. जब यह सब हो रहा था, भारत भर में किसान चुपचाप आत्महत्या करते रहे.

गांधी, भगत सिंह, सुभाष, नेहरू और पटेल समेत तमाम महापुरुषों की कल्पना में कम यह कल्पना तो नहीं ही रही होगी कि सरकार एक एक निर्णय लेगी और डेढ़ दो सौ लाग मर जाएंगे. किसान कर्ज के पहाड़ के नीचे दब दब कर मरेंगे, उनके बच्चे भूख से मरेंगे और दिल्ली की सरकार कैशलेश अर्थव्यस्था का नया भारत गढ़ रही होगी. यह डिजिटल भारत गांधी के सपनों का भारत नहीं है.

Courtesy: The Wire

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